सोमवार, 4 जनवरी 2021

इल्तुत्मिश की प्रारम्भिक कठिनाईया व उसकी उपलब्धिया- (1210- 1236 ई.)-

  इल्तुत्मिश  की प्रारम्भिक कठिनाईया व उसकी उपलब्धिया- (1210- 1236 ई.)- 

भूमिका- 

        1210 ई . में एबक की मृत्यु के पश्चात उसका दामाद इलतुत्मिश दिल्ली की गद्दी पर बैठा। उसे गुलामो का गुलाम कहा जाता है क्योकि  मुहम्म्द गौरी के गुलाम कुतुबुद्दीन एबक ने इसे खरीदा था ,उसकी योग्यता से प्रभावित होकर प्रारम्भ में ही उसे सर- ए- जहाँ (अंगरक्षको का प्रधान ) की उपाधि से नवाज दिया था। और वह अपनी पुत्री का विवाह इलतुत्मिश से किया था। लेकिन वह शम्सी वंश का था। इसलिए उसके वंश का नाम शम्सी वंश पड़ा। भारत में तुर्को का वास्तविक संस्थापक इल्तुत्मिश ही था। भारत में मुस्लिम प्रभुसत्ता का वास्तविक प्रारम्भ भी इल्तुतमिश से ही होता है।उसे भारत-विजय की स्थायित्व को प्रदान करने का श्रेय दिया जाता है। किंतु उसके राज्याभिषेक के समय ही अली मर्दान खान ने स्वय को बंगाल  का तथा दूसरी ओर एबक का एक साथी गुलाम कुवाचा ने मुल्तान में खुद को स्वतंत्र शासक घोषित कर लिया।जिससे इल्तुत्मिश को प्रारम्भ से ही कठिनाईयो का सामना करना पड़ा लेकिन इन प्रारम्भिक कठिनाइयो का उसने अपनी योग्य सैनिक व प्रशासनिक क्षमताओ के द्वारा डटकर सामना किया और अनेक उपलब्धिया हासिल की ।

इल्तुतमिश की प्रारम्भिक कठिनाईया- 

1 .विभाजित साम्राज्य

2.राजपूत राजाओ का स्वतंत्र होना

3.एल्दौज का दिल्ली सल्तनत पर दावा

4.कुतुबी अमीर

------विभाजित साम्राज्य - केवल दिल्ली का राज्य इल्तुतमिश को प्राप्त हुआ था। एबक की मृत्यु के बाद उसका जीता हुआ साम्राज्य चार भागो में बटा हुआ था। सुदूर बन्गाल के लखनौती में अली मरदान के खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था तथा पश्चिम में मुल्तान का भाग कूवाचा के अधीन था। और एल्दौज ने पश्चमि पन्जाब पर अधिकार कर लिया था।

-----राजपूत राजाओ का स्वतंत्र होना - एबक की अचानक मृत्यु के बाद तुर्क सल्तनत बिखर गई।राजपूत राजाओ ने इस स्थिति का लाभ उठाकर स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। उन्होने दिल्ली को कर देना बंद कर दिया। जिसमे जालौर और रणथम्भौर प्रमुख थे। तुर्को के विरुध्द अजमेर ,ग्वालियर, बयाना, और दोआब के राजपूतो ने भी विद्रोह कर दिये। केवल दिल्ली , बदायु, पूरब वाराणसी और उत्तर में शिवालिक पर्वत का क्षेत्र ही इल्तुत्मिश के अधिकार में था।

-----एल्दौज का दिल्ली सल्तनत पर दावा - गजनी का शासक एल्दौज एबक के समय दिल्ली के तुर्क साम्राज्य पर अपना दावा कर रहा था। और एबक की मृत्यु के बाद उसकी इच्छा बलवती हो गई जिससे दोनो के बीच संघर्ष होने लगा।

-----कुतुबी अमीर - अनेक एबक के अमीर इल्तुतमिश के विरोधी थे। आरामशाह का समर्थन करते थे। वे इल्तुतमिश को सुल्तान सुल्तान के रूप में स्वीकार नही करते थे । जिससे दिल्ली में षड़यंत्र की स्थिति बनी रहती थी।
इल्तुत्मिश का साम्राज्य

इल्तुत्मिश की उलब्धिया
1. - एल्दौज से समझौता
2. - अमीरो का  दमन
3. - एल्दौज का दमन
4.- मंगोल आक्रमण का भय
5.- कुवाचा का दमन
6.-  बंगाल की विजय
7.- राजपूत राज्यो पर विजय
8.- बुंदेलखंड की पुनर्विजय
9.-  दोआब पर पुनर्विजय
10.- खलिफा का अधिकार -पत्र

 एल्दौज से समझौता- 
                       इल्तुतमिश इन सभी समस्याओ का एक साथ सामना कर सकने में सशक्त नही था। अत: सैनिक उपायो के स्थान  पर उसने कूटनीति का सहारा लिया।
अमीरो का  दमन -  
                            इस समय इल्तुतमिश के सामने अनेक कठिनाईया का अम्बार था जिसमें अमीर वर्ग प्र्मुख  थे जो उसका विरोध कर रहे थे। आरामशाह ने अपना दल बनाया तथा कुछ अमीरो के साथ  मिलकर षड़यंत्र करके विद्रोह कर दिया। इन विद्रोहो को उसने बहुत रक्तपात करने के बाद दमन किया। 
मंगोल आक्रमण का भय- 
                       1220ई. में मंगोल आक्रमण का भय दिल्ली के नव -संगठित राज्य के लिये उत्पन्न हो गया । मंगोलो ने चंगेज खान के नेतृत्व में मध्य एशिया के ख्वारिज्म के राज्य को तहस- नहस कर डाला। ख्वारिज्म का युवराज जलालुद्दीन मांगबर्नी भागकर पंजाब की ओर भागा। मंगोलो ने तेजी से पीछा किया। खोखर सामंत की पुत्री से विवाह कर उससे सहायता प्राप्त किया। और कुवाचा को पराजित करके दोआब क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। इसके बाद वह लाहौर की ओर बढा और इल्तुतमिश के पास दूत भेज कर प्रार्थना की कि वह शरण देने की कृपा करे । इल्तुतमिश इस बात से परिचित था कि मंगबर्नी को शरण देना का अर्थ होगा मंगोलो का आक्रमण । अत: उसने शर्ण देना इंकार कर दिया। इस प्रकार इल्तुतमिश ने दूरदर्शिता का परिचय दिया।
कुवाचा का दमन-  
                 एबक का एक साथी गुलाम कुवाचा ने मुल्तान में खुद को स्वतंत्र शासक घोषित कर लिया।जिससे इल्तुत्मिश को प्रारम्भ से ही कठिनाईयो का सामना करना पड़ा लेकिन इल्तुतमिश ने  उसने दमन कर किया। 
बंगाल की विजय
                      उसके राज्याभिषेक के समय ही अली मर्दान खान ने स्वय को बंगाल  का स्वतंत्र  शासक घोषित कर लिया था। वह अत्याचारी शासक था। 1226 ई. इल्तुत्मिश का पुत्र नासिरुद्दीन ने उसे पराजित किया तथा उसका वध कर दिया।  फिर भी बंगाल में अशांति की स्थिति बनी हुई थी। 1230 ई. मे पुन: इल्तुतमिश ने सेना भेजकर बंगाल पर अधिकार कर लिया।
 राजपूत राज्यो पर विजय-  
                  तुर्को के विरुध्द अजमेर ,ग्वालियर, बयाना, और दोआब के राजपूतो ने भी विद्रोह कर दिये। केवल दिल्ली , बदायु, पूरब वाराणसी और उत्तर में शिवालिक पर्वत का क्षेत्र ही इल्तुत्मिश के अधिकार में था। इल्तुतमिश ने अपने जीते हुए राज्यो को पुन: 1226 तथा 1227ई. में सेना भेजकर अधिकृत कर लिया व उसने वहा तुर्क सूबेदारो की नियुक्ति कर दी।-
 बुंदेलखंड की पुनर्विजय
                उसे यहाँ आंशिक सफलता ही मिली।1231ई. में ग्वालियर्को जीतकर यहाँ का सुबेदार रशीदउदीन को बनाया। तथा1233ई में मलिक तसाई को कालिंजर पर आक्रमण करने भेजा,तसाई ने बुंदेलखंड को को लूट लिया लेकिन कालिंजर पर अधिकार न कर सका।
दोआब पर पुनर्विजय- 
                     दोआब के अनेक क्षेत्र एबक की मृत्यु के बाद स्वतंत्र हो गये थे। एक द्ढ संकल्प के साथ दोआब के क्षेत्रो पर पुन: अधिकार कर लिया और वहाँ पर अपने पुत्र नासिरुद्दीन को सूबेदार नियुक्त किया।
खलीफा का अधिकार -पत्र - 
                     दिल्ली क्षेत्र में की पुनर्विजय के द्वारा इल्तुतमिश ने सल्तनत को फिर से स्थापित किया। उसे इस कार्य में 25 वर्ष लग गये और उसने सल्तनत को स्थायित्व प्रदान किया। उसने दिल्ली सल्तनत तथा सुल्तान पद की वैधानिक मान्यता के लिए खलीफा अल- मुस्तगीर- बिल्लाह से अधिकार -पत्र और खिलअत प्राप्त की। इस प्रकार वह दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक और उसका प्रथम सुल्तान था। 1236ई. में उसकी  मृत्यु बामियान जाते समय मार्ग में हो गई। 

निर्माण कार्य- 

                    स्थापत्य कला के अन्तर्गत इल्तुतमिश ने कुतुबुद्दीन ऐबक के निर्माण कार्य (कुतुबमीनार) को पूरा करवाया। भारत में सम्भवतः पहला मक़बरा निर्मित करवाने का श्रेय भी इल्तुतमिश को दिया जाता है। इल्तुतमिश ने बदायूँ की जामा मस्जिद एवं नागौर में अतारकिन के दरवाज़ा का निर्माण करवाया। उसने दिल्ली में एक विद्यालय की स्थापना की। इल्तुतमिश का मक़बरा दिल्ली में स्थित है, जो एक कक्षीय मक़बरा है।

इल्तुतमिश का मकबरा,दिल्ली


सिक्कों का प्रयोग-

              इल्तुतमिश पहला तुर्क सुल्तान था, जिसने शुद्ध अरबी सिक्के चलवाये। उसने सल्तनत कालीन दो महत्त्वपूर्ण सिक्के 'चाँदी का टका' (लगभग 175 ग्रेन) तथा 'तांबे' का ‘जीतल’ चलवाया। इल्तुतमिश ने सिक्कों पर टकसाल के नाम अंकित करवाने की परम्परा को आरम्भ किया। सिक्कों पर इल्तुतमिश ने अपना उल्लेख ख़लीफ़ा के प्रतिनिधि के रूप में किया है। ग्वालियर विजय के बाद इल्तुतमिश ने अपने सिक्कों पर कुछ गौरवपूर्ण शब्दों को अंकित करवाया, जैसे “शक्तिशाली सुल्तान”, “साम्राज्य व धर्म का सूर्य”, “धर्मनिष्ठों के नायक के सहायक”। इल्तुतमिश ने ‘इक्ता व्यवस्था’ का प्रचलन किया और राजधानी को लाहौर से दिल्ली स्थानान्तरित किया।

रज़िया को उत्तराधिकार

                         रज़िया सुल्तान इल्तुतमिश की पुत्री तथा भारत की पहली मुस्लिम शासिका थी। अपने अंतिम दिनों में इल्तुतमिश अपने उत्तराधिकार के सवाल को लेकर चिन्तित था। इल्तुतमिश के सबसे बड़े पुत्र नसीरूद्दीन महमूद की, जो अपने पिता के प्रतिनिधि के रूप में बंगाल पर शासन कर रहा था, 1229 ई. को अप्रैल में मृत्यु हो गई। सुल्तान के शेष जीवित पुत्र शासन कार्य के किसी भी प्रकार से योग्य नहीं थे। अत: इल्तुतमिश ने अपनी मृत्यु शैय्या पर से अपनी पुत्री रज़िया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।


















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