शनिवार, 16 जनवरी 2021

रजिया सुल्तान एवम उसके शासनकाल की प्रमुख कठिनाईयो और रजिया की असफलता के कारणों की विवेचना

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रजिया सुल्तान एवम उसके शासनकाल की प्रमुख कठिनाईयो और उसकी असफलता के कारणों की विवेचना-

रजिया सुल्तान -1236 - 1240 ई.., दिल्ली सल्तनत


भूमिका-

          इल्तुतमिश के समय से ही दिल्ली में अमीरो तथा अधिकारियो ने इल्तुतमिश की योग्य पुत्री रजिया के उत्तराधिकार का विरोध किया था। लेकिन वजीर शाहतुर्कान तथा वजीर कमालुद्दीन जुनैद से अमीर लोग घृणा करने लगे और वे दिल्ली में शांति तथा व्यवस्था की स्थापना के लिए रजिया का साथ दिया। जिससे रजिया को सल्तनत की राजगद्दी तो प्राप्त हो गई लेकिन उसका मार्ग कांटो से भरा हुआ था,उसका सिन्हासन फूलो का सेज न होकर एक कांटो का ताज था। 

            रक्नुद्दीन, का शासन बहुत ही कम समय के लिये था, इल्तुतमिश की विधवा, शाह तुर्कान का शासन पर नियंत्रण नहीं रह गया था। विलासी और लापरवाह रक्नुद्दीन के खिलाफ जनता में इस सीमा तक आक्रोश उमड़ा, कि 9 नवंबर 1236 को रक्नुद्दीन तथा उसकी माता, शाह तुर्कान की हत्या कर दी गयी। उसका शासन मात्र छह माह का था। इसके पश्चात सुल्तान के लिए अन्य किसी विकल्प के अभाव में मुसलमानों को एक महिला को शासन की बागडोर देनी पड़ी।। और रजिया सुल्तान दिल्ली की शासिका बन गई।

चित्र स्रोत- printerest ,दिल्ली सल्तनत राजनैतिक दशा
 रजिया की प्रारम्भिक कठिनाईया-

1. विरोधियो की समस्या

2. राजपूतो के विद्रोह

3. समर्थन का अभाव

4. रजिया का स्त्री होना

विरोधियो की समस्या-     

        रजिया प्रमुख विरोधी उसके भाई के समर्थक थे, जिनके विद्रोह की सम्भावना थी। वे रजिया को अपदस्थ करके ऐसे व्यक्ति को गद्दी पर बैठाना चाहते थे जो दुर्बल और उनकी इच्छानुसार कार्य कर सके। षड्‍‌यंत्रकारियो में ईख्तियार आईतीन, भटिन्डा का शासक मलिक अल्तूनिया तथा लाहौर का सूबेदार कबीरखा प्रमुख थे। 

राजपूतो का विद्रोह

      तुर्को की अस्थिरता का लाभ उठाकर राजपूतो ने भी विद्रोह का झंडा बुलंद किया और उन्होने रजिया को हटाकर पुन: खोई हुई सत्ता प्राप्त करने का प्र्यत्न किया।

समर्थन का अभाव

        रजिया को दिल्ली के सभी नागरिक तथा अधिकारियो का समर्थन प्राप्त नही था । उसे केवल साधारण जनता का ही समर्थन प्राप्त था। प्रधानमंत्री जुनैदी तथा अन्य तुर्क सरदारो ने सदैव रजिया का विरोध किया। वे अपनी इच्छानुसार सम्राट का चुनाव करना चाहते थे। इससे अन्य प्रांतीय सम्राटो को भी विद्रोह करने के लिये प्रेरणा प्राप्त हुई।

रजिया का स्त्री होना -

           रजिया के स्त्री होंने के कारण अनेक तुर्क अमीर , स्त्री के शासन में रहना पसंद नही करते थे। वे रजिया को राजपद के लिये उपयुक्त नही समझते थे। कट्टर मुसलमान इसके प्रबल विरोधी थे क्योकि एक स्त्री का सुल्तान होना मुस्लिम कानून और भावनाओ के विरुध्द था। यद्यपि रजिया में योग्य प्रशासिका के सारे गुण विद्यमान थे ,परंतु उसका स्त्री होना ही, उसकी कठिनाई का कारण बना।


कठिनाईयो के समाधान के लिए रजिया के कार्य-

1. विद्रोहो का दमन

2. सल्तनत के उच्च पदो में परिवर्तन- 

3. राजपूतो पर विजय

विद्रोहो का दमन- 

            सर्वप्रथम रजिया ने अपने विद्रोहियो का दमन करने का निश्चय किया । बदायू , मुलतान ,हासी और लाहोर के सुबेदारो तथा फिरोज का वजीर निजामुलमुल्क जुनैदी मिलकर दिल्ली की ओर बढे और रजिया को राजधानी में घेर लिया। विद्रोहियो में आपस में एकता नही थी और वे एक -दूसरे से ईर्ष्या और द्वेष रखते थे। रजिया ने इनका लाभ उठाकर विद्रोहियो में फूट पैदा कर दी और वे आपस में लड़कर बिखर गए ,इसी अवसर पर रजिया ने उनपर आक्रमण कर दिया और दोनो को पकड़ कर कत्ल करवा दिया । वजीर जुनैदी भाग खड़ा हुआ और रास्ते में ही सिरमूर की पहाड़ियो में मर गया। इस विजय से रजिया की प्रतिष्ठा में वृध्दि हुई। अनेक प्रांतीय शासको ने आतंकित होकर रजिया की अधीनता स्वीकार कर ली।

सल्तनत के उच्च पदो में परिवर्तन- 

           इसके पश्चात उसने अपनी सत्ता को दृढ बनाने के लिए राज्य के उच्च पदो में परिवर्तन किया। ख्वाजा मुहाजबुद्दीन को अपना वजीर नियुक्त किया। तुर्को के स्थान पर अन्य मुसलमानो को उच्च पदो पर प्र्तिष्ठित किया। उसने एक हब्सी याकूत को घुड़्सवारो का सरदार नियुक्त किया। मलिक हसन को अपना प्रधान सेनापति नियुक्त किया। रजिया ने पर्दे का त्याग कर दिया और दरबार में बैठकर पुरुषो की भांति फरियाद सुनने लगी। वह स्वयम विभिन्न विभागो की देखभाल करने लगी।

राजपूतो पर विजय

             दिल्ली की राजनैतिक अव्यवस्था का फायदा उठाकर राजपूतो ने रणथम्भौर पर पुन: अधिकार करने का प्रयास किया। रजिया ने एक सेना भेजकर मुसलमानो को मुक्त करवाया ।ग्वालियर के दुर्ग का दुर्गपति रजिया के खिलाफ विद्रोह की कोशिश कर रहा था। रजिया ने उसे बंदी बना लिया। 

रजिया के असफलता के कारण- 

1. रजिया का नारी होना

2. तुर्क सरदारो का स्वार्थ

3. रजिया की स्वेच्छाचारिता

4. जनता के सहयोग का अभाव

5. इल्तुतमिश के व्यस्क पुत्रो का जीवित रहना

6. केंन्द्रीय सरकार की दुर्बलता

7. याकूब से प्रेम 

          यद्यपि  रजिया इल्तुतमिश के अन्य उत्तराधिकारियो में सबसे योग्य थी, परंतु वह शासन चलाने में असफल रही । उसकी असफलता के निम्न कारण थे- 

रजिया का नारी होना- 

         मध्यकालीन इतिहासकारो ने रजिया की असफलता का सबसे बड़ा कारण उसका स्त्री होना माना है।  रजिया के स्त्री होंने के कारण अनेक तुर्क अमीर , स्त्री के शासन में रहना पसंद नही करते थे। वे रजिया को राजपद के लिये उपयुक्त नही समझते थे। कट्टर मुसलमान इसके प्रबल विरोधी थे क्योकि एक स्त्री का सुल्तान होना मुस्लिम कानून और भावनाओ के विरुध्द था। यद्यपि रजिया में योग्य प्रशासिका के सारे गुण विद्यमान थे ,परंतु उसका स्त्री होना ही, उसकी असफलता का कारण बना।

तुर्क सरदारो क स्वार्थ- 

          असफलता का दूसरा कारण तुर्क सरदारो का स्वार्थ और उनका सशक्त होना था। रजिया को दिल्ली के सभी नागरिक तथा अधिकारियो का समर्थन प्राप्त नही था । उसे केवल साधारण जनता का ही समर्थन प्राप्त था। प्रधानमंत्री जुनैदी तथा अन्य तुर्क सरदारो ने सदैव रजिया का विरोध किया। वे अपनी इच्छानुसार सम्राट का चुनाव करना चाहते थे। इससे अन्य प्रांतीय सम्राटो को भी विद्रोह करने के लिये प्रेरणा प्राप्त हुई। 

रजिया की स्वेच्छाचारिता- 

        रजिया ने निरंकुश व स्वेच्छाचारी शासन स्थापित करना चाहा। तुर्की अमीरो को जिन्होने एबक के शासन काल में ही राज्य की सारी शक्ति अपने हाथो में ले रखी थी। और अपने को सैनिक भाईचारे की भावना में बांध लिया ,एक नारी का निरंकुश व स्वेच्छाचारी शासन स्वीकार नही कर पाये। 

इल्तुतमिश के व्यस्क पुत्रो का जीवित रहना-   

      इल्तुतमिश के व्यस्क पुत्रो का जीवित रहना रजिया के लिए खतरनाक सिध्द हुआ। इससे षड़यंत्रकारियो को प्रोत्साहन मिला,वे इनकी आड़ में रजिया पर प्रहार करने लगे।  

केंन्द्रीय सरकार की दुर्बलता-

       स्थानीय हिंदुओ के निरंतर विद्रोह को दबाने के लिए सुल्तानो को अपने प्रांतीय शासको को पर्याप्त मात्रा में सैनिक तथा प्रशासनिक अधिकार देने पड़ते थ्र्। अत: ये हाकिम कभी भी गठबंधन कर केंद्रीय सरकार के खिलाफ विद्रोह कर देते थे।

याकूब से प्रेम -

         रजिया का याकूब नामक हब्सी से विशेष प्रेम  था, जो तुर्की अमीरो को खटकता था। याकूब का पद तथा उसकी जाति ऐसी थी कि रजिया की उसमे विशेष अनुरक्ति होना नितांत अनुचित था। याकूब तथा रजिया के सम्बंधो के विषय में इतिहासकारो में मतभेद है, जहाँ इब्नबतूता उसे अपराधी मानता है वही दूसरी ओर मिनहाज -उस -सिराज  पर कोई आरोप नही लगाता।





                   

                                                     









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