शनिवार, 6 फ़रवरी 2021

मौर्य प्रशासन- Maurya's Administration - सारगर्भित नोट्स - बी.ए. प्रथम वर्ष

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भूमिका –

    
                                            चित्र स्रोत- गूगल

सम्पूर्ण मौर्य प्रशासन प्रमुखत: दो भागो में विभक्त था।

1.केंद्रीय प्रशासन.

2. प्रांतीय प्रशासन.

मौर्यों का केंद्रीय प्रशासन उच्च कोटि का प्रशासन था। प्रशासन में सर्वोच्च स्थान राजा का होता था तथा उसकी सहायता के लिये अनेक मंत्री होते थे। केंद्रीय सरकार के अनेक विभाग थे। सम्पूर्ण साम्राज्य अनेक प्रशासनिक इकाईयां बंटा था। प्रांतो से ग्रामों तक विभिन्न राजकीय अधिकारी छोटे थे। सेना, न्याय, राजस्व, जनकल्याण के लिये विभाग संगठित थे।

विसेंट स्मिथ के अनुसार – “समस्त प्रशासनिक संगठन राज्य का आभास देता है।

1.   केंद्रीय प्रशासन

Ø राजा

Ø मंत्री मंडल

Ø मंत्रीपरिषद

Ø अधिकारी(प्रशासन तंत्र)

राजा- 

प्रशासन में राजा सर्वोच्च था। वह समस्त सैनिक, न्याय, कार्यकारी क्षेत्रो में सर्वोच्च अधिकारी होता था। कौटिल्य के अनुसार राजा के आदेश को धर्म, परम्पराओ, लोकाचार से श्रेष्ठ माना जाना चाहिए। एक शक्ति सम्पन्न राजा में योग्यता होना अति आवश्यक था। ऐसे राजा का महत्व बताते हुए कौटिल्य कहते हैं कि – “ राजा का शील होता है, वही प्रजा का शील होता है। यदि राजा परिश्रमी और उन्नतिशील हो तो प्रजा भी उन्नतिशील हो जाती है। राजा यदि दुर्व्यसनी हो तो प्रजा भी वैसी ही हो जाती है।“

मौर्य प्रशासन में राजा  ,प्रजा के लिए पिता तुल्य होता है। अपनी प्रजा के हित में निरंतर कार्य करना राजा के लिए व्रत के समान होता था। राजा के प्रमुख कार्य सेना का नेतृत्व करना, प्रजा को न्याय देना, उच्च कर्मचरियो की नियुक्ति करना, कोष की व्यवस्था करना, दूतों का संवाद सुनना, गुप्तचरो के समाचारों पर विचार करना और प्रजा के आचरण के लिए राज्य- घोषणाएं करना आदि।

मौर्य साम्राज्य: प्रशासन

शाही राजधानी पाटलिपुत्र के साथ मौर्य साम्राज्य चार प्रांतों में विभाजित था। अशोक के शिलालेखों से प्राप्त चार प्रांतीय राजधानियों के नाम-

मौर्य साम्राज्य का विभाजन -

 पाटलिपुत्र की शाही राजधानी के साथ मौर्य साम्राज्य चार प्रांतों में विभाजित था। अशोक के शिलालेखों से प्राप्त  चार प्रांतीय राजधानियों के नाम-

1. तोसली (पूर्व में),

2. उज्जैन (पश्चिम),

3. स्वर्णागिरी (दक्षिण में)

4. तक्षशिला (उत्तर में) थे।

राजा ने चरवाहों, किसानों, व्यापारियों और कारीगरों आदि से कर लेने के लिए अधिकारियों को नियुक्त किया था। राजा प्रशासनिक अधिरचना का केंद्र होता था और मंत्रियों और उच्च अधिकारियों की नियुक्ति राजा करता था। प्रशासनिक ढांचा इस प्रकार था‌-

 कौटिल्य ने मौर्य प्रशासनिक ढांचे को सप्तांग सिध्दांत के आधार पर विभाजित किया था। राज्य के कार्यो का संचालन के लिए विभिन्न विभाग बनाए थे। राजा को मंत्रीपरिषद (मंत्रियों की परिषद) द्वारा सहायता प्राप्त होती थी ।  जिसके सदस्यों में अध्यक्ष और निम्नांकित सदस्य शामिल होते थे-

  • 1. युवराज- युवराज
  • 2. पुरोहित- मुख्य पुजारी
  • 3. सेनापति-  प्रमुख कमांडर
  • 4. आमात्य- सिविल सेवक और मंत्रीगण।
  • 5. कोष – वित्त विभाग राज्य की रक्षा के लिये किले अथवा सुरक्षा दिवार्।
  • 6. दुर्ग
  •     वित्त विभाग राज्य की रक्षा के लिये किले अथवा सुरक्षा दिवार्।
  • मित्र     -पड़ोसी मित्र राज्य ।

विद्वानों द्वारा दिये गये सुझावों के बाद मौर्य साम्राज्य को आगे चलकर महत्वपूर्ण अधिकारियों के साथ विभिन्न विभागों में विभाजित कर दिया गया था।जिन्हे कौटिल्य ने 18 तीर्थों (अधिकारी) में विभाजित किया है।

राजस्व विभाग  -

 महत्वपूर्ण अधिकारीगण-

1. सन्निधाता- मुख्य कोषागार,

    2. समाहर्ता - राजस्व संग्राहक मुखिया

सैन्य विभाग –

मेगस्थनीज के अनुसार, साम्राज्य के प्रयोग के लिए 600,000 पैदल सेना, 30,000 घुड़सवार सेना, और 9000 युद्ध हाथियों की समारिक सेना थी। आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के उद्देश्य के लिए एक विशाल जासूस प्रणाली थी जो अधिकारियों और दूतों पर नजर रखती थी।



मेगस्थनीस ने सैन्य गतिविधियों के समन्वय के लिए इन छह उप समितियों के साथ एक समिति का उल्लेख किया है। पहले का काम नौसेना की देखभाल करना, दूसरे का काम परिवहन और प्रावधानों की देखरेख करना था, तीसरे के पास पैदल सैनिकों, चौथे के पास घोडों, पांचवे के पास रथों और छठे के पास हाथियों के देखरेख की जिम्मेदारी थी।

गुप्त्चर विभाग – कौटिल्य ने गुप्तचर को राज्य का आवशक अंग माना है। उन्होने उन्हे गुढ-पुरूषों (जासूस) की संज्ञा दी है।  राज्य के विकास में बाधक ऐसे अनैतिक कार्य जैसे भ्रष्टाचार, चोरी, रिश्वतखोरी, अनैतिक आचरण में लिप्त अधिकारीगण आदि की गुप्त रूप से निरीक्षण कर राज्य को सूचना देने का कार्य गुप्तचर विभाग का होता था।

 

पुलिस प्रशासन

जेल को बंदीगृह के रूप में जाना जाता था और लॉक से भिन्न थी जिसे चरका कहा जाता था। यह सभी प्रमुख केंद्रों के पुलिस मुख्यालयों में होती थी।

2. प्रांतीय और स्थानीय प्रशासन-

  • 1. प्रादेशिका- आधुनिक जिला मजिस्ट्रेट,
  • 2. स्थानिका- प्रादेशिका के तहत कर संग्रह अधिकारी,
  • 3. दुर्गापाला- किले के गवर्नर,
  • 4. अकक्षापताला -महालेखाकार,
  • 5. लिपीकार- लेखक,
  • 6. गोप- लेखाकार आदि के लिए जिम्मेदार था।

 

नगर प्रशासन-

महत्वपूर्ण प्रशासनिक अधिकारी-

  • 1. नगारका- शहर प्रशासन का प्रभारी,
  • 2. सीता- अध्यक्ष-  कृषि पर्यवेक्षक,
  • 3. सामस्थ-अध्यक्ष- बाजार अधीक्षक,
  • 4. नवाध्यक्ष- जहाजों के अधीक्षक,
  • 5. शुल्काध्यक्ष-  पथ-कर के अधीक्षक,
  • 6. लोहाध्यक्ष- लोहे के अधीक्षक,
  • 7. अकाराध्यक्ष- खानों के अधीक्षक,
  • 8. पौथवाध्यक्ष-  वजन और माप आदि के अधीक्षक।

ग  ग्राम प्रशासन - ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी ईकाई होती थी।

  •       जिसका प्रमुख  ग्रामिण होता था। 10 ग्रामो के समूह का अध्यक्ष को गोप कहा जाता था। ये सभी ग्राम के विकास के लिये उत्तरदाई होते थे। 

 मेगस्थनीज  ने छ: समितियों का उल्लेख किया है जिसमें पांच पाटलिपुत्र का प्रशासनिक देखभाल करती थी। उद्योगों, विदेशियोंजन्म और मृत्यु का पंजीकरण, व्यापारनिर्माण और माल की बिक्री और बिक्री कर का संग्रह प्रशासन के नियंत्रण में था।

 

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