मंगलवार, 16 मार्च 2021

महात्मा गांधी व दांडी यात्रा/ gandhi and daandi march

 महात्मा गांधी व दांडी यात्रा/ Gandhi and Daandi march-


भूमिका-

     आने वाली पीढियां शायद मुश्किल से ही यह विश्वास कर सकेंगी कि गांधी जैसा हाड़-मांस का पुतला कभी इस धरती पर हुआ होगा।‘’ 

          -वैज्ञानिक अल्बर्ट  आईस्टीन




                         

आधुनिक भारतीय चिंतकों में यद्पि अनेकानेक लेखकों एवं विचारकों ने योगदान दिया है किंतु आधुनिक भारत के निर्माताओ में युग पुरूष महात्मा गांधी का नाम एवं योगदान अद्वितीय है। उन्होने आधुनिक विश्व को वह हथियार दिया जो स्वरूप में भारतीय होते हुए भी विश्व के सभी देशो द्वारा अपनाया जा रहा है। उनका सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह सम्बंधी विचार विश्व पटल पर छाया हुआ है। गांधी जी को राजनेता, मनीषी, विचारक, दार्शनिक, मानवतावादी, शांतिवादी और विश्वबंधुत्व के समर्थक आदि सब कुछ कहा जा सकता है किंतु सबसे ज्यादा महत्व उनका इस दृष्टि से है कि उन्होने विश्व को सत्य और अहिंसा का अक्षुण्ण एवं शाश्वत मार्ग बताया। 

डा. के एम. मुंशी ने गांधी जी के विषय में बताया है कि – “ गांधी जी ने अराजकता पायी और उसे व्यवस्था में परिवर्तित कर दिया, कायरता पायी और उसे साहस में बदल दिया, अनेक वर्गो में विभाजित जनसमूह को राष्ट्र में बदल दिया, निराशा को सौभाग्य में बदल दिया और बिना किसी प्रकार की हिंसा या सैनिक शक्ति का प्रयोग किए एक साम्राज्यवादी शक्ति के बंधनों का अंत कर विश्वशांति को जन्म दिया। इससे अधिक न तो कोई व्यक्ति कुछ कर सका है और न ही कर सकता है।”

गांधी जी का जीवन परिचय -

    महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर सन 1869 को पोरबंदर (गुजरात) में हुआ था। इनके पिता  करमचंद गान्धी राजकोट के दीवान थे। इनकी मां का नाम पुतलीबाई था। जो करमचंद गांधी जी की चौथी पत्नी थी। गांधी जी की मां बहुत ही  आध्यात्मिक प्रवृत्ति की थी। उनकी दिनचर्या घर और मंदिर में पूजा पाठ करने मे व्यतीत होता था। वह हमेशा उपवास रखती थी और परिवार में कोई भी व्यक्ति बीमार हो जाता तो वह उसकी सेवा करने में दिन रात एक कर देती थी। महात्मा गांधी का लालन पालन वैष्णव मत को मानने वाले परिवार में हुआ और उनके जीवन पर कठिन नीतियों वाले जैन धर्म का गहरा प्रभाव पड़ा जिसके सिद्धांत सत्य अहिंसा एवं विश्व की सभी वस्तुओं को शाश्वत मानना है। उन्होंने अपने जीवन में स्वाभाविक रूप से सत्य ,अहिंसा शाकाहार ,आत्म शुद्धि के लिए उपवास और विभिन्न धर्मों को मानने वालों के बीच परस्पर भाईचारे की भावना को अपनाया। महात्मा गांधी के व्यक्तित्व पर उनकी माता के चरित्र की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।महात्मा गांधी विद्यार्थी के रूप में एक औसत विद्यार्थी थे। महात्मा गांधी जब स्कूल में पढ़ते थे उसी समय 13 वर्ष की आयु में ही एक व्यापारी की पुत्री कस्तूरबा से उनका विवाह कर दिया गया।   युवावस्था में गांधी जी सन 1887 में जैसे-तैसे मुंबई यूनिवर्सिटी की मैट्रिक परीक्षा पास की और भावनगर में स्थित सामलदास कॉलेज में प्रवेश लिया। अचानक गुजराती से अंग्रेजी भाषा में उन्हें व्याख्यानों को समझने में दिक्कत आने लगी इसी बीच उनके भविष्य को लेकर उनके परिवार में चर्चा चल रही थी। महात्मा गांधी डॉक्टर बनना चाहते थे लेकिन वैष्णव परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें चिरफाड की इजाजत नहीं थी। साथ ही यह भी स्पष्ट था कि यदि उन्हें गुजरात के इसी राजघराने में ऊंचा पद प्राप्त करने की जो उनके परिवार में परंपरा चली आ रही है उन्हें निभाना है तो उन्हें बैरिस्टर बनना पड़ेगा और ऐसे में गांधीजी को बैरिस्टर की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड जाना पड़ा। वैसे भी गांधीजी का मन उनके सामलदास कॉलेज में पढ़ाई करने में नहीं लग रहा था इसलिए उन्होंने इस प्रस्ताव को सहज ही स्वीकार कर लिया उनके मन में इंग्लैंड की छवि दार्शनिकों और कवियों की भूमि संपूर्ण सभ्यता के केंद्र के रूप में थी।


 महात्मा गांधी सितंबर 1888 में लंदन पहुंच गए वहां पहुंचने के 10 दिन बाद वह लंदन के चार कानून महाविद्यालयों में गए तथा उनमें से एक इनर टेंपल में दाखिला ले लिया। ट्रांसवाल सरकार ने 1906 में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय जनता के पंजीकरण के लिए विशेष रूप से एक अपमानजनक अध्यादेश जारी किया। सन उन्नीस सौ छह में जोहानेसबर्ग में भारतीयों ने गांधी जी के नेतृत्व में एक विरोध जनसभा का आयोजन किया और इस अध्यादेश के उल्लंघन तथा इसके परिणाम स्वरूप दंड भुगतने की शपथ ली।इस प्रकार पहली बार महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का प्रयोग सर्वप्रथम दक्षिण अफ्रीका में किया जो वेदना पहुंचाने के बजाय उन्हें झेलने विद्वेषण प्रतिरोध करने और बिना हिंसा किए उससे लड़ने की नई तकनीक थी। इसके पश्चात दक्षिण अफ्रीका में 7 वर्ष से भी अधिक समय तक संघर्ष चलता रहा। इसमें अनेक उतार-चढ़ाव आते रहे,लेकिन महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय अल्पसंख्यकों के छोटे से समुदाय ने अपने शक्तिशाली प्रतिपक्षियों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। अनेकों भारतीयों ने अपने आत्म सम्मान को चोट पहुंचाने वाले इस कानून के सामने झुकने के बजाय अपनी नौकरी व आजादी की बलि चढ़ाना अधिक पसंद किया।

 गांधी जी का राजनीतिक व सामाजिक जीवन गांधीजी सन 1914 में वापस भारत लौट आए। उनके लौटने पर भारत के लोगों ने उनका बड़े धूमधाम से स्वागत किया और उन्हें महात्मा पुकारना शुरू कर दिया।उन्होंने 4 वर्षों तक भारतीय स्थिति को जाना व उन लोगों को तैयार किया जो उनका साथ सत्याग्रह में भारत में प्रचलित सामाजिक व राजनीतिक बुराइयों को हटाने में दे सकते थे। सन 1919 में जब अंग्रेजों ने रोलेट एक्ट जारी किया तो गांधी जी ने इसका जमकर विरोध किया तथा सत्याग्रह आंदोलन की घोषणा कर दी। गांधी जी के अथक प्रयासों से अंग्रेजों को रोलेट एक्ट हटाना पड़ा। इस कामयाबी के बाद महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के लिए कई और अभियान किए जिनमें से सत्याग्रह और अहिंसा के विरोध जारी रखेंअसहयोग आंदोलननागरिक अवज्ञा आंदोलनदांडी यात्रा तथा भारत छोड़ो आंदोलन किया। गांधीजी के इन सभी अथक प्रयासों से भारत वर्ष को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिली।हमारी आजादी के 1 वर्ष बाद ही नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को गांधी जी को गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। और यह महान आत्मा सदा-सदा के लिए पंचतत्व में विलीन हो गए।

महात्मा गांधी और दांडी मार्च-


गांधी जी के युग की समस्याएं बड़ी गम्भीर थीं। विदेशी शासन से मुक्ति पाना अर्थव्यवस्था के पुनर्वास की समस्या के समाधान की तुलना में कठिन माना जाता है। यद्यपि हम आजाद हो गये, पिछड़ी एवं कमजोर अर्थव्यवस्था हमें विरासत में मिली , गांधी जी के सामने लोगों में एकात्मक भाव पैदा करने की प्रबल समस्या थी। नमक मार्च, जिसे दांडी मार्च या नमक सत्याग्रह के नाम से भी जाना जाता है, मार्च-अप्रैल 1930 में मोहनदास (महात्मा गांधी) के नेतृत्व में भारत में प्रमुख अहिंसक विरोध प्रदर्शन हुआ। सविनय अवज्ञा (सत्याग्रह) के एक बड़े अभियान में मार्च पहला कार्य था|



दांडी मार्च क्यों हुआ –

भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को गांधी जी के नेतृत्व में भारत के तमाम क्षेत्रों के लोगों ने 240 लंबी लंबी यात्रा शुरू की थी। जिसका मकसद था, नमक पर अंग्रजों द्वारा बनाये गए कर व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म करना। दरअसल अंग्रेजों ने नमक बनाने पर टैक्स लगा रखा था जबकि देश के गरीब किसान भुखमरी का शिकार हुए जा रहे थे।सविनय अवज्ञा (सत्याग्रह) के एक बड़े अभियान के रूप में मार्च पहला कदम था, जो 1931 की शुरुआत में प्रभावशाली हुआ और भारतीय जनता ने महात्मा गाँधी का समर्थन किया और सत्याग्रह ने दुनिया भर के लोग का ध्यान केन्द्रित किया। भारत में नमक उत्पादन और वितरण लंबे समय से ब्रिटिशों का एक आकर्षक एकाधिकार था।कई कानूनों के माध्यम से, भारतीयों को स्वतंत्र रूप से नमक बनाने या बेचने पर रोक लगा रखी थी, और इसके बजाय भारतीयों को नमक महंगा खरीदना पड़ता था, नमक पर भारी रूप से कर लगाया जाता था, जिसे अक्सर आयात किया जाता था। इसने बहुत से भारतीयों को प्रभावित किया, जो लोग गरीब थे, वो इसे खरीदना नहीं चाहते थे।जिसके लिए महात्मा गांधी के नेतृत्व में नमक कानून तोड़्ने के विरोध में दांडी यात्रा शुरू हुई।

गांधी जी के नेतृत्व में दांडी मार्च-

19वीं शताब्दी में नमक कर के खिलाफ भारतीयों ने विरोध का प्रदर्शन शुरू किया और पूरे उपमहाद्वीप के ब्रिटिश शासनकाल में यह एक बड़ा विवादित मुद्दा बन गया। 1930 के शुरूआत में, गांधी ने सदाबहार नमक कर के खिलाफ उच्च प्रदर्शन करने का फैसला किया, जो कि भारतीय राज्य गुजरात के माध्यम से शुरू हुआ उन्होंने अपने आश्रम (अहमदाबाद के पास) अरब सागर तट पर 12 मार्च को पैदल, कई दर्जन स्वयं सेवकों के साथ यात्रा शुरू की ।

प्रत्येक दिन की यात्रा के बाद समूह उस मार्ग पर एक नए गांव में, जहां गरीब जनता पर लगाये जाने वाले कर की अन्याय के खिलाफ गांधी रेली को सुनने के लिए अधिक से अधिक भीड़ इकट्ठा होती थी।

सैकड़ों से भी अधिक अनुयायियों के मूल समूह में शामिल हुए, क्योंकि वे 5 अप्रैल तक समुद्र तक पहुंचना चाहते थे , और सभी 5 अप्रैल को दूतावास के करीब 240 मील (385 किमी) की यात्रा के बाद दांडी पहुंचे।

दांडी यात्रा का उद्देश्य-

इस यात्रा के पीछे और भी बहुत सारे उद्देश्य थे। इस यात्रा से सिर्फ नमक कानून नहीं टूटा था, बल्कि भारत पर इसके वृहद परिणाम दिखाई दिए थे। जब हम अपने इतिहास के संघर्षों के बारे में जानेंगे तभी हम इस आजादी के असली मूल्य को समझ पाएंगे और उसका आंकलन कर पाएंगे। दान्डी यात्रा भारत के तत्कालीन परिस्थितियों की देन जरूर थी परंतु उसका असर भावी पीढियों के लिये प्रेरणा का स्रोत रही। उसके उद्देश्य एवम स्वरूप निम्न बिंदुओ में परिलक्षित हुए-

1.       सन 1920 से लेकर 1922 तक चले असहयोग आंदोलन के बाद आजादी की लड़ाई वाला माहौल ठंडा पड़ गया था। आजादी की लड़ाई तो चल रही थी, लेकिन उसमें वो गर्मजोशी का माहौल नहीं बन पा रहा था जो कि असल में होना चाहिए था।

2.       इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज की मांग की घोषणा कर दी। अंग्रेजों को खुले तौर पर बता दिया गया कि अब हम किसी भी तरह की कोई पराधीनता स्वीकार नहीं करेंगे। अब हमें पूर्ण आजादी चाहिए। घोषणा तो हो गई, अब बारी थी कुछ करने की।

 

3.       कांग्रेस के तमाम सुप्रीम नेताओं जैसे जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल आदि ने गांधी जी के साथ बैठक किया। गांधी जी ने एक रास्ता सुझाया कि बिना किसी हिंसा के हम अंग्रेजों के बनाए गए कानूनों को एक-एक करके तोड़ देंगे, तो धीरे-धीरे सारे कानून भंग हो जाएंगे। और इस तरह हम स्वतः ही आजाद हो जाएंगे।

 

4.       सबसे पहले गांधी जी ने नमक की खेती करने वाले किसानों पर लगाए गए टैक्स के विरोध में अंग्रेजों के कानून को तोड़ने का सुझाव दिया। लेकिन वो नेहरू और सरदार पटेल को बहुत अच्छा नहीं लगा था। जहां एक तरफ पटेल ने जमीन पर लगाए गए टैक्स पर आंदोलन की बात कही तो दूसरी तरफ जवाहरलाल नेह को कपोल कल्पना लगी

 

5.       गान्धी जी का तर्क था कि मानव जीवन में नमक बहुत महत्वपूर्ण होता है, और इस आंदोलन में हर जाति धर्म के लोग शामिल होंगे। दूसरी बात ये कि अंग्रेजों की कुल राजस्व आय का 8.2 प्रतिशत भाग नमक उत्पादन पर लगाये गए कर से प्राप्त होता है।

 

6.       उस समय के प्रमुख कांग्रेस नेताओं में से एक सी. राजगोपालाचारी को महात्मा गाँधी की बात समझ आ गयी। 5 फरवरी को समाचार पत्रों में छपा कि गांधी जी सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत पैदल यात्रा करने जा रहे हैं। जिसमें वह नमक बनाने पर अंग्रेजों के कानून को तोड़ेंगे।

7.        फरवरी के अंत दांडी मार्च का पूरा खाका तैयार हो चुका था। अंग्रेज इसको कोई महत्व नहीं दे रहे थे। उनको लगता था कि इन सब चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यहां तक कि खुद वायसराय लार्ड इरविन ने इसको कोई महत्व नहीं देते हुए, लंदन को लिखित पत्र में कहा था-“कि मुझे नहीं लगता कि वर्तमान में नमक कानून को लेकर जो चलने वाला है उसमें कुछ खास दम है”

 गांधी जी को कहीं ना कहीं इस बात का एहसास हो चुका था, कि आंदोलन से पूर्ण स्वराज वाले आंदोलन को बल मिलेगा और उसका मार्ग प्रशस्त होगा। उन्होंने अपने तर्क में यह भी बोला था कि इस आंदोलन से हिंदू मुस्लिम में एकता की भावना भी उत्पन्न होगी।

 

9.       6 अप्रैल की सुबह, गांधी और उनके अनुयायियों ने मिलकर समुद्र के किनारे पर नमक को मुट्ठी भर उठाया, इस प्रकार तकनीकी रूप से “उत्पादन” नमक और कानून तोड़ दिया, और गांधीजी ने सभी देश वासियों को नमक बनाने की आज्ञा दी। सैकड़ों से भी अधिक अनुयायियों के मूल समूह में शामिल हुए, क्योंकि वे 5 अप्रैल तक समुद्र तक पहुंचना चाहते थे, और सभी   दूतावास के करीब 240 मील (385 किमी) की यात्रा के बाद दांडी पहुंचे।

निष्कर्ष- 

आज हम परिवर्तन के युग के मध्य जीवन यापन कर रहे हैं। आज विश्व में जो कोई महान आंदोलन हो रहे हैं उनमे महात्मा गांधी द्वारा प्रवर्तित आंदोलन मूल्य एवम प्रतीक के रूप  में सबसे अधिक परिवर्तन कर रहा है और जब वस्तुत: ऐसा परिवर्तन हो जाएगा और बडे पैमाने पर उसकी प्रतिष्ठा हो जाएगी तो वह सचमुच क्रांति होगी। महात्मा गांधी को एक फरिश्ता, एक युगदृष्टा, समाज सुधारक, उदारवादी, एक संघर्षकर्त्ता, एक विचारक और अंतत: एक मानवतावादी के रूप में जाना जा सकता है।

गांधी ज्ञान आधारित शिक्षा के स्थान पर आचरण आधारित शिक्षा के समर्थक थे। उनके अनुसार शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को अच्छे- बुरे का ज्ञान करा सके, नैतिक रूप से सबल व सक्षम बना सके। व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए उन्होने वर्धा योजना में प्रथम सात वर्षो की शिक्षा को नि:शुल्क एवं अनिवार्य करने की बात कही है। तथा उन्होने मातृभाषा में प्रारम्भिक शिक्षा पर जोर दिया है। आज के दौर में उनकी पॖासन्गिकता और भी बढ जाती है। क्योकि उनके सिध्दांतो के अनुसार साम्प्रदायिक सद्भावना स्थापित करने के लिए सभी धर्मो ,विचारधारओ को साथ लेकर चलना आवश्यक है। लेकिन इसके साथ विरोधाभास भी यह है कि कोई भी इनके सिध्दांतो को खुले मन से स्वीकार करने तैयार नही है । जबकि 20वी शता. में अनेक प्रभावशाली लोगो जैसे मदर टेरेसा, मार्टिन लूथर आन सूकी,दलाई लामा, मिखाईल गोर्बाचोव, नेल्सन मडेला आदि ने गांधी की विचारधारा को अपनाकर अपने देश में परिवर्तन के बीज बोए। गांधी जी ने अपने जीवन के समस्त अनुभवो को भारत देश की आजादी में लगा दी लेकिन विडम्बना यही है कि वे 32 वर्षो तक आजादी की लड़ाई लड़ी ,लेकिन जब देश आजाद हुआ तो केवल 168 दिन ही आजाद भारत में जीवित रहे। आज विश्व में जब भी कभी शान्ति वार्ता की बात या परिवर्तन की बात आती है तो केवल गांधी ही याद आते हैं । वर्तमान में गांधी की प्रासंगिकता साम्प्रदायिक कट्टरता और आतन्कवाद के इस परिवर्तन के युग में उन्होने एक युग तक हमारे भारत का मार्गदर्शन किया और आज उन्हे भारतीय राष्ट्र के पिता होने का गौरव प्राप्त है। आज का यह तर्कसंगत प्रश्न हो सकता है कि क्या गांधी हमारी रूपरेखा के भविष्यकालिक समाज के निर्माण में सहायक हैं अथवा वे इस युग के लिए अप्रासंगिक हो चुके हैं और  क्या हमें उनको बिदाई दे देनी चाहिए ? क्या उत्तर आपके पास है......



 

 

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