प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली/Indian Education System/Idea Of Bharat

 


प्रस्तावना-

         भारत की सामाजिक संरचना में शिक्षा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। प्राचीन काल से ही भारत में शिक्षा की अनेक पद्धतियों का विकास हुआ उसके विषय में हमें अधिक ज्ञान नहीं परंतु फिर भी हम साहित्यिक स्रोतों के आधार पर कह सकते हैं कि शिक्षा का स्तर उच्चतम था। प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली नैतिकता पर आधारित थी। मनुस्मृति में वर्णित है कि – “सभी वेदों का ज्ञाता विद्वान भी सच्चरित्रता के अभाव में श्रेष्ठ नहीं है, किन्तु केवल गायत्री मंत्र का ज्ञाता पंडित भी यदि वह चरित्रवान है तो श्रेष्ठ कहलाने योग्य है।”  भारत में शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रमुख रूप से तीन प्रकार की शिक्षण संस्थाएं प्रचलन में थी जो कि शिक्षा प्रदान करती थी। पहली प्रकार की संस्था इस प्रकार की होती थी जिसमें अध्यापक अल्प आयु के बच्चों को अपनी संस्था में प्रवेश दिला कर अपने घर पर ही शिक्षा प्रदान करता था। बच्चा अपने पिता से भी शिक्षा प्रदान करता था। साधारणतः बच्चे अभिभावक की प्रार्थना करने पर प्रवेश पाते थे और उपनयन संस्कार दिया जाता था। विद्यार्थी सामान्यतः 12 वर्ष अपने गुरु के साथ बिताते थे। इस अवधि में वह गुरु के घर पर अर्थात गुरुकुल में ही रहते थे मुख्यतः उनके द्वारा जो कार्य किए जाते थे वे इस प्रकार होते थे जैसे- अध्यापक के लिए भिक्षा मांगना, यज्ञ के लिए लकड़ी एकत्र करना, घर के सब काम और पशुओं की देखभाल करना। बाकी समय विद्यार्थी अपने अध्ययन में बिताते थे।

प्रमुख आश्रम-

 1. सांदीपनि आश्रम

 2. वाल्मीकि आश्रम

 3. द्रोणाचार्य आश्रम

       उपरोक्त आश्रमों विद्यार्थी बड़े आदरभाव से विद्या अध्ययन करते थे। वहीं गुरु द्वारा अपनी ओर से कुछ नैतिक एवं आध्यात्मिक कर्तव्य निभाए जाते थे। गुरु पवित्र ज्ञान में भी पारंगत होते थे और उससे आशा की जाती थी कि वह अपने शिष्यों को सत्य का मार्ग दिखाएं। बिना कुछ छिपाए वे भारतीय आर्यों को ज्ञान प्रदान करते थे। स्रोत बताते हैं कि शिक्षण का समय और विषय जनजातियों के लिए एक समान नहीं था। ब्राह्मण विद्यार्थी अध्यापन कार्य के लिए और यज्ञ कराने एवं उपहार पाने के लिए शिक्षित किए जाते थे जबकि क्षत्रिय लोगों की रक्षा करने के लिए शिक्षा प्रदान की जाती थी। परंतु हमें उपनिषद के कुछ ऐसे विवरण भी मिलते हैं जिसमें क्षत्रिय राजकुमारों ने वेद पढ़े और पवित्र ज्ञान के विषय में दक्षता प्राप्त की जो विशेष रूप से ब्राह्मणों की जायदाद समझी जाती है।  उदाहरण के लिए अगर हम देखें तो विदेह का राजा जनक एक ज्ञानवान क्षत्रिय था जो ब्राह्मणों को पवित्र शिक्षा देता था।

शिक्षा देने की पद्धति-

        वैदिक काल में शिक्षा गुरुओं द्वारा मौखिक दी जाती थी। विद्यार्थी प्रश्न पूछते थे और उन से यह आशा की जाती थी कि संबंधित विषय पर वह अपने विचार व्यक्त करें और ध्यान (meditation) करें। वह ध्यान द्वारा सत्य और वास्तविकता का ज्ञान करते थे। यह सब प्रकार की इच्छाओं का दमन करने पर और सांसारिक पाप, मोह को छोड़ने पर और पवित्रता पाने पर ही हो पाता था। यह केवल सन्यास और योग द्वारा ही संभव हो सकता था। पहले अपना परिवार घर और सब प्रकार की इच्छाओं को छोड़ने पर होता था और योग सब प्रकार की इंद्रियों पर काबू पाने पर और मस्तिष्क को एकाग्र करने पर और आत्मा के साथ सामंजस्य करने पर होता था।

प्राचीन भारत महिला शिक्षा-

         “आप किसी राष्ट्र में महिलाओं की स्थिति देखकर उस राष्ट्र के हालात बता सकते हैं।” यह कथन पं.  जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में कहा था। अर्थात किसी भी राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक विकास महिलाओं की शैक्षिक स्थिति पर निर्भर अवश्य करती है। महिला और पुरुष समाज के दो पहिए हैं जो समान रूप से शिक्षित होकर समाज को प्रगति के पथ पर ले जा सकते हैं। भारत में महिला शिक्षा का इतिहास वैदिक काल से ही जुड़ा हुआ है। उल्लेखनीय है कि लगभग 3000 से भी अधिक वर्ष पूर्व वैदिक काल के दौरान महिलाओं को समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त था और उन्हे पुरुषों के समान समाज का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता था। महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था। रचना उपनिषद में हमें विवरण मिलता है कि गार्गी आध्यात्मिक वाद-विवादों में भाग लेती थी। उपनिषद में विवरण है कि बहुत सी महिलाएं वैदिक ज्ञान में पारंगत होती थी। वैदिक काल में घोषा, अपाला, विश्वतारा आदि महिलाओं का वर्णन मिलता है जो अत्यधिक शिक्षित मानी जाती थी।

उच्च शिक्षा व्यवस्था-

        दूसरे प्रकार की संस्थाएं उच्च शिक्षा प्रदान करती थीं। जो आरंभिक शिक्षा से संतुष्ट नहीं होते थे वे अकादमी शिक्षा ग्रहण करते थे। विशेष योग्यता प्राप्त और साहित्यिक योग्यता रखने वाले विद्यार्थी देश के विभिन्न भागों में सभाएं करते थे और उन सभाओं में वे आध्यात्मिक वाद- विवाद करते थे, जो विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे वे इन सभाओं में विशेष योग्य व्यक्तियों से वाद-विवाद करते थे और आत्मा के विषय में ज्ञान प्राप्त करते थे। इन शैक्षिक सभाओं में जो विद्यार्थी वाद-विवाद करते थे उनकी उस शिक्षा का पता चलता था जो उन्होंने आश्रम  से प्राप्त की थी।

      आगे हम देखते हैं कि इन सभाओं के अतिरिक्त शासक वर्ग भी शैक्षिक सभाएं करते थे और इन सभाओं में वाद विवाद के लिए विभिन्न विद्यालयों के विशेष योग्यता प्राप्त व्यक्तियों को आमंत्रित किया जाता था। इस प्रकार की सभाएं उन दिनों ज्ञान का प्रसार करने के लिए बहुत लाभदायक थीं। इस प्रकार की ऋषियों की सभाओं का वर्णन हमें वृहद रणपाका उपनिषद, शतपथ ब्राम्हण और वायु पुराणों में मिल जाता है। भारतीय शिक्षा पद्धति या व्यवस्था को जानने के लिए  प्रमुख रूप से निम्न काल खंडों में विभाजित करके इसका विश्लेषण किया जा सकता है-

1. महाकाव्य काल में शिक्षा व्यवस्था

2. स्मृति काल में शिक्षा व्यवस्था

5 वीं शताब्दी में शिक्षा व्यवस्था

3. 7वीं शताब्दी में शिक्षा व्यवस्था

महाकाव्य काल में शिक्षा व्यवस्था-

         महाकाव्य और स्मृति ग्रंथ हमें यह ज्ञान प्राप्त कराते हैं कि उनके समय में शिक्षा क्षेत्र में बहुत उन्नति हो गई थी पूरा जीवन चार आश्रमों में बांट दिया गया था और युवावास्था में बहुत कठोर अनुशासन के साथ शिक्षा प्राप्ति में व्यतीत होता था। यह शिक्षा प्रयोगात्मक होती थी। क्योंकि शिक्षा का तरीका और भिन्न-भिन्न जाति के युवाओं के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की होती थी। प्रारंभिक शिक्षा गुरुकुल में होती थी जहां पर विद्यार्थी को बहुत कठोर अनुशासन में रहना होता था। शिक्षा, चरित्र निर्माण पर बहुत जोर देती थी। मानसिक और शारीरिक विकास पर भी जोर दिया जाता था। शिक्षा मुफ्त दी जाती थी और शिक्षक किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लेते थे। गुरुकुल दूर जंगलों में बने होते थे जहां पर देश के विभिन्न मार्गो से गुरुकुल में विद्वान गुरुओं से शिक्षा प्राप्त करने आते थे इस प्रकार का एक प्रसिद्ध गुरुकुल सोनाका के अधीन नेमीसा था। जिन्होंने 10,000 शिष्यों को शिक्षा प्रदान की। कण्व ऋषि का आश्रम भी ज्ञान प्राप्त करने का प्रसिद्ध केंद्र था। यहां पर विभिन्न प्रकार के विषयों के विभिन्न विद्वान थे जैसे-  चारों वेद, कला, यज्ञ संबंधी ज्ञान, व्याकरण और अन्य विषयों में प्रसिद्ध आश्रम के वशिष्ठ, विश्वामित्र और व्यास मुनि थे। शिक्षा का विषय विभिन्न जाति के लोगों के लिए भिन्न-भिन्न था। क्षत्रिय राजकुमारों को जो शिक्षा प्रदान की जाती थी उसका हमें विस्तृत वर्णन है। वह केवल वेदों का ही ज्ञान प्राप्त नहीं करते थे अपितु धनुर्विद्या भी सीखते थे। युद्ध कला में मल्ल युद्ध, आमने सामने का युद्ध, समूह में युद्ध करना, तलवार चलाना, हाथी और रथ चलाना, शंक विज्ञान, गाना, काव्य शिल्प और कहानियां आदि विषय होते थे।

स्मृति काल में शिक्षा व्यवस्था-

                 बच्चे की शिक्षा आरंभ करने का शुभारंभ विद्याआरंभ उत्सव के द्वारा किया जाता था। इसकी जानकारी हमें अनेक स्मृतियों से उस समय की शिक्षा के विषय में प्राप्त हो जाती है साधारणतः यह संस्कार 5 वर्ष की आयु में किया जाता था इस संस्कार के साथ बच्चा प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करता था परंतु वास्तविक शिक्षा उपनयन संस्कार के साथ ही आरंभ की जाती थी 3 जातियों के विद्यार्थियों के लिए भिन्न-भिन्न नियम से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य। ब्राह्मण लोग बसंत महंत में विद्याधन करते थे। जबकि क्षत्रिय और वैश्य गर्मी और पतझड़ में। पानायन की आयु भी तीनों जातियों के लिए भिन्न -भिन्न थी ब्राह्मण के लिए 8 से 16 वर्ष की थी। 11 से 22 क्षत्रियों के लिए और 12 से 24 वर्षों का समय वैश्यों के लिए। स्मृतिकाल में पुरुषों के समान ही स्त्रियों को शिक्षा प्राप्ति का अधिकार प्राप्त था। परंतु मनु स्त्री शिक्षा के प्रति उदासीन थे, यह तब स्पष्ट हो जाता है जब वे कन्या के विवाह की आयु आठ वर्ष निर्धारित करते हैं। वे स्त्रियों को शूद्रवत शिक्षा से वंचित रखने का विधान करते हैं। नारद और परासर जैसी स्मृतियां भी स्त्री शिक्षा में मौन ही है।

      विद्यार्थी का जीवन बहुत नियमित होता था। उसे सूर्योदय से पहले उठना पड़ता था। वह स्नान करके अपने आप को पवित्र करता था, फिर वह गांव के बाहर एक पवित्र स्थान पर ध्यान लगाता था। लौटने पर वह देवताओं और साधु को फल का दान (अर्घ्य) देता था। देवताओं की मूर्ति की पूजा करता था और यज्ञ के लिए लकड़ी रखता था। विद्यार्थी को विलासिता की वस्तुएं, खुशबूदार फूल मालाएं, जूते, धातु प्रयोग करने की मनाही थी। वह दिन के समय नहीं सोता था और नाच गाने से दूर रहता था। वह चरित्र संबंधी गुणों का विकास करता था जैसे कि- कामवासना से दूर रहना, क्रोध, ईर्ष्या, वात्सल्य से दूर रहना आदि इसमें शामिल होता था। वह स्त्रियों से बात नहीं करता था जब तक कि बहुत ही आवश्यक ना हो। वह झूठ बोलने से, चुगली करने से और जीव-जंतुओं को चोट पहुंचाने से दूर रहता था।

        इस काल में गुरु बहुत ऊंची योग्यता रखते थे। साधारणतया अध्यापक वंशागत विद्वान होते थे और पवित्र शिक्षा में पारंगत होते थे। अध्यापकों की विभिन्न जातियां थी। आचार्य शिष्यों को निशुल्क वेद पढ़ाते थे, उपाध्याय शिष्यों को वेद के विशेष भाग और वेद के अंग पढ़ाते थे, और इसके लिए वे शुल्क भी लेते थे। परंतु इन अंतरों के होते हुए भी वह अपने शिष्यों को अपने पुत्र के समान प्रेम करते थे और पूरे मन से उन्हें पवित्र ज्ञान देते थे। विद्यार्थियों को दंड देना आम बात नहीं थी। सामूहिक दंड तभी दिया जाता था जब उसे सुधारने के समस्त उपाय व्यर्थ हो जाते थे। अध्ययन के नियम के विषय में व्यास वेद और उनके रहस्य पढ़ाए जाते थे। विष्णु पुराण इतिहास के अनुसार विधान और पवित्र कानून भी अध्ययन में विद्यार्थियों को तीन प्रकार का ज्ञान दिया जाता था -

1. सांसारिक ज्ञान (काव्य संबंधी)

2. पवित्र ज्ञान और (वेद- वेदांग संबंधित)

3. ईश्वरी ज्ञान।

शिक्षा समावर्तन (विद्यार्थियों का घर लौटना) के साथ समाप्त हो जाती थी। इसके साथ ही विद्यार्थियों पर जो अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए जाते थे वे भी समाप्त हो जाते थे।

5वीं शताब्दी में शिक्षा व्यवस्था-

         पांचवी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में शिक्षा के बारे में कुछ ज्ञान प्राप्त नहीं होता कि किस प्रकार की शिक्षा तत्कालीन भारत में दी जाती थी। परंतु चीनी यात्री फाह्यान के लेख से हमें पांचवी शताब्दी के शिक्षा प्रदान करने के विषय में महत्वपूर्ण जानकारियां मिल जाती हैं। फाह्यान भारत में एक तीर्थयात्री के रूप में चीन से आया जो चीन में बुद्ध संघ के लिए विनय कृति एकत्र करने आया था। यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि भारत की सभ्यता देश के बाहर भी फैली हुई थी और उसी सभ्यता के विषय में ज्ञान प्राप्त करने भारत आए थे। फाह्यान ने उत्तर पश्चिम में पंजाब से लेकर बंगाल में तुगलग की लंबी यात्रा की। मार्ग में उसे अनेक बौद्ध मठ मिले जिनमें बौद्ध भिक्षु रहते थे। फाहियान के लेखों से ही हमें ज्ञान प्राप्त होता है कि उस समय पाटलिपुत्र ज्ञान प्राप्त करने का बहुत बड़ा केंद्र था। शहर में दोमत का प्रचलन केंद्र थे। एक महायान मत का और दूसरा हीनयान मत का और दोनों में लगभग 700 बौद्ध भिक्षुक रहते थे। यह बौद्ध विहार युवा वेदों की प्रारंभिक शिक्षा ही नहीं देते थे अपितु शिक्षा प्रदान करने की भी उन्नति शील केंद्र के प्रख्यात विद्वान इन बौद्ध विहारों में रहते थे। यह बौद्ध विहार राजा और व्यापारियों द्वारा दान दिए धन से चलाए जाते थे।

        मौखिक शिक्षा देने की प्रथा भी थी। फाह्यान की द्वितीय प्रतिलिपि प्राप्त करने में बहुत कठिनाई हुई जिससे कि वह उसको नकल कर सके। केवल पाटलिपुत्र के महायान बौद्ध विहार में और ताम्रलिप्ति के बौद्ध विहार में उसे यह उपलब्ध हुई। इससे हमें पूर्ण ज्ञान होता है कि उत्तर भारत में मौखिक शिक्षा देने का प्रचलन था पूर्व में कुछ लिखित साहित्य भी थे।

        फाहियान से हमें शिक्षा के विषय में भी ज्ञान प्राप्त होता है। इसमें विनय भी है और जिसमें महा संहिता के नियम भी हैं। कुछ वास्तुवाद नियम भी हैं जो 6 या 7 गाथाओं हैं। एक कुल जिसमें 2500 गाथाएं हैं। परिनिर्वाण विपुल सूत्र में जिसमें 5000 गाथाएं और महासंहिता अभिधम्म है। एक और बात जो ध्यान देने योग्य है वो यह है कि उस समय भी संस्कृत भाषा साहित्यक भाषा के रूप में प्रचलन में थी।

7वीं शताब्दी में शिक्षा व्यवस्था-

        विदेशी यात्रा वृतांत के अंतर्गत प्रमुख रूप से सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग जो कि भारत में लगभग 629 ई. में आये और यहां 15 वर्ष रहे। भारत की शिक्षा व्यवस्था पर उन्होंने उल्लेख किया है कि तत्कालीन भारत में ब्राह्मणवादी शिक्षा उन्नति कर रही थी और संस्कृत भाषा साहित्यिक भाषा थी और अत्यंत उन्नत शील थी। ब्राह्मणवादी शिक्षा चारों वेदों के अध्ययन पर जोर देती है। इस समय भी शिक्षा मौखिक रूप से दी जाती थी और गुरु इस बात के लिए आवश्यक प्रयास करते थे ताकि विद्यार्थी में विचार शक्ति उत्पन्न हो सके। आगे ह्वेनसांग लिखते हैं कि विद्यार्थियों का विद्या ग्रहण करने का काल काफी लंबा होता था और जब विद्यार्थी 30 साल का हो जाता था तब विद्यार्थी का समय समाप्त हो जाता था विद्यार्थियों का एक भाग सांसारिक माया मोह को छोड़कर पूर्णत विभिन्न प्रकार की कला और विज्ञान सीखने में अपने आप को समर्पित कर देते थे।

          बौद्ध विहार, बौद्ध धर्म का ज्ञान प्राप्त करने का बहुत महत्वपूर्ण केंद्र होता था ह्वेनसांग बताते हैं कि यद्यपि इस काल में आते-आते तक बौद्ध धर्म का ह्रास हो रहा था, परंतु फिर भी विभिन्न बौद्ध विहारों में भिक्षु पर्याप्त संख्या में रहते थे। कुछ प्रमुख बौद्ध विद्वान जिनका हेनसांग ने वर्णन किया है जिसमें मुख्य रूप से असंग, सुबंधु, पार्श्व, चंद्रवर्मा, अश्वघोष, नरेंद्रमद्रा आदि है। बौद्ध विहार महाविद्यालय थे जहां पर विद्यार्थी अपनी प्रारंभिक शिक्षा समाप्त करने के बाद प्रवेश पाते थे।

         हवेनसांग के अनुसार प्रारंभिक शिक्षा बच्चे को पहले सिद्धि अथवा संस्कृत भाषा के अक्षर ज्ञान के 12 अध्याय जिनमें स्वर और व्यंजन से शब्द बनाए जाते थे आदि के बारे में अध्ययन कराया जाता था इसके बाद उसे पांच विद्वान के शास्त्र पढ़ाए जाते थे। इन पांच शास्त्रों का क्रम कुछ इस प्रकार है इसमें प्रमुख रूप से व्याकरण, शिल्प विद्या, अस्याना विद्या, चिकित्सा विद्या, हेतु विद्या, अध्यात्म विद्या सम्मिलित थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रारंभिक शिक्षा में धार्मिक और सामूहिक दोनों प्रकार की शिक्षा दी जाती थी और आध्यात्मिक और प्रयोगात्मक दोनों प्रकार के विषय पढ़ाए जाते थे।

        आगे उच्च शिक्षा के विषय में हवेनसांग उल्लेख करते हैं कि उच्च शिक्षा का विषय और उद्देश्य दोनों ही मूल्यवान था जोकि बौद्ध विहारों द्वारा दी गई थी। बहुत से विहार प्रयोगात्मक और व्यवहारिक दोनों प्रकार की शिक्षा प्रदान करते थे। एक बौद्ध विहार एक विशेष धार्मिक संप्रदाय से संबंधित होता था और इसी संप्रदाय से संबंधित विषय में शिक्षा देता था परंतु दूसरे संप्रदाय के भिक्षु और विद्यार्थी भी भर्ती किए जाते थे।

       इस प्रकार हम देख सकते हैं कि यह बौद्ध विहार दूसरे विश्वविद्यालयों की भांति नहीं थे जो कि संकुचित विचारधारा रखते हैं इन बिहारों में समस्त विषयों का समावेश अध्ययन के लिए कराया जाता था। शिक्षा का पुराना तरीका भी साथ-साथ चलता था। विद्यार्थियों के भूल करने पर अपराध के अनुसार दंड दिया जाता था। ज्ञान की परीक्षा चरित्र निर्माण और बुद्धिमता की योग्यता भी इस काल में प्रचलन में था रहे थे। ब्राह्मणवादी अभ्यास कि ग्रंथों के लोगों की उपासना करना और उनका अर्थ समझना अभ्यास में था। विद्यार्थियों की योग्यता इस बात पर निर्भर करती थी कि वह आज सभाओं में किस प्रकार श्लोकों का उच्चारण करता है और उनकी क्या रचना करता है इस प्रकार बिहारों में भी आम सभाओं में वाद-विवाद प्रतियोगिताओं द्वारा विद्वानों की योग्यता को आँकने का तरीका अपनाया जाता था और योग्य विद्वानों को पारितोषिक दिया जाता था।

        इस काल में चरित्र निर्माण के लिए भी शिक्षा दी जाती थी और उसका उतना ही महत्व था जितना की अन्य विषयों का। भिक्षुओं का चरित्र और व्यवहार नियमों के अनुसार होता था। अनुशासन पर भी जोर दिया जाता था और भूल करने पर अपराध के अनुसार दंड दिया जाता था। ज्ञान की परीक्षा, चरित्र निर्माण और बुद्धिमत्ता की योग्यता भी प्रचलन में थी।

निष्कर्ष

       इस प्रकार प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के अंतर्गत विशेषत: वैदिक कालीन शिक्षा विधि में विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास पर बल दिया जाता था। गुरुकुल में गुरु का ध्यान प्रत्येक बालक के रुचि एवं योग्यता को पहचानकर उसे पारंगत करने पर आधारित था। बालक के गुण, प्रकृतियाँ, विशिष्ट क्षमताऐं जो उनके द्वारा संपादित किए जाने वाले कार्यों एवं व्यवहार में परिलक्षित होती थीं और उन्ही से समाज, देश व विदेश में पहचान बनती थी और ऐसे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व से पूरा समाज आलोकित होता था। प्राचीन ज्ञान परंपरा में आचरण की महत्ता, सभ्यता व संस्कृति का अंगीकार, गुरुओं के प्रति श्रद्धा भाव, कर्तव्य एवं नियमों के प्रति प्रतिबद्धता, आत्मनिर्भरता का सबक, परिस्थितियों से मुकाबला करने में ही सफलता, स्वच्छता का संदेश, राष्ट्रप्रेम, पद-प्रतिष्ठा से विलग रहने की प्रेरणा, जनहित को प्राथमिकता, परिश्रम से अर्जित आय महत्वपूर्ण, लक्ष्य के प्रति समर्पण, अवसर का लाभ उठाना, प्रशंसा की जगह आलोचना को महत्व देना आदि अनेक गुणों के विकास पर ध्यान दिया जाता था। आज हमें गुरुकुल जैसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था को पुन: स्थापित करने की आवश्यकता है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली हमें असंवेदनशील बना रही है। निरंतर बढ़ रहे अंधाधुंध प्रतिस्पर्धा की होड़ में विद्यार्थी तनावग्रस्त होता चला जा रहा है। जिससे विद्यार्थी के अंदर राष्ट्र निर्माण की भावना का अभाव एवं हीनता का भाव पनप रहा है। नई शिक्षा नीति यदि इसमें भारतीयता का पुट लाने में कामयाब रही तो यह अपने आप में एक अभूतपूर्व शैक्षिणिक पहल होगी।

 



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